Monday, April 20, 2009

चिंता मत कर

चिंता मत कर ऐ इंसान, तेरे साथ रहेंगे भगवान
निर्भय बन तू सौंप उन्हें इस जीवन की कमान
चिंता करने से नहीं जग में कोई दु:ख होता है कम
सच्चा इंसान कोशिश करते-करते ही भरता है दम
किया ना चिंता अभिमन्यू ने जब चक्रव्यूह में थे फंसे
देख इस कर्तव्य को प्रभु के नयनों में से थे नीर बहे
कोशिश करते करते जीना ही है सच्चा बलिदान
धीरज से हर संजोगों का करना तू सन्मान
तुने जो भी मांगा प्रभु देता ही है आया
सुख-दु:ख में साथ रहकर उसने तुज पर प्रीत बहाया
उम्मीदें तेरी बढती गई हर बार ऐ इंसान
दे प्रभु तुझे जितना तु उसमें ही संतोष मान

Saturday, April 18, 2009

ऊंचाई की लडाई

ऊंचाई के लिए यह लडाई है
नींव की भी उसे बहुत जरुरत है
गलती सिर्फ कदमों की नहीं,
यह डगर ही बडी मुश्किलों से भरी है
तु न करना गिनती कदमों के अपने
क्योंकि कबसे चल रहा यह खेल है
थोडा सा भी आराम अब मिलता नहीं
सब कुछ आज, अभी, इसी वक्त की जरुरत है

अकेला शहर

यह शोर-शराबे का शहर है
ओ सन्नाटे तुझे क्या खबर है?
रात के पीछे रात चली जा रही है
बंद हो गया अब सूरज का सफर है
शोर-शराबे में भी अकेला शहर है
किसकी लगी आज उसको नजर है
देख, फिर से निकला है सूरज वहां पर
मगर आज वो परछाई के बगैर है

मुश्किल

कभी मुश्किल बन जाती मुश्किल है
मंजिल भी हो जाती मुश्किल है
खुद हमारे पदचिन्ह हमारी मुश्किल बन जाते है
सभी मानते है कि मंजिल होती है मुश्किल
लेकिन पहले बाधाएं ही मुश्किल बन जाती है

Friday, April 17, 2009

जुते-चप्पल की हेट्रिक

आज के अखबार में ताजा छपी खबर
बीजेपी के संमेलन में हादसा कल भरी दोपहर
अपनी-अपनी डफली, अपना अपना राग
जनतंत्र में घुल गया है बस आग ही आग
सब दल के है सूर नए बदली सबकी चाल
आग लगाता-सा लगे ये चुनाव इस साल
लगता है इस भूचाल का होगा ना ठहराव
सियासत के समंदर की देखो डगमग होती नाव
उन्माद की सियासत में हाल हुए बेहाल
जूते से किया विरोध और करने लगे हलाल
भीतर दबी है आंधियां, है बाहर भी तूफान
देश के इतिहास में है तीसरा ये जूते की मार
सत्ता लालसुओं ये अब तो करो कबूल
फिर भी नहीं सुघरे तो जनता चटवायेगी धूल
जूता चुक गया मस्तक समय बना गंभीर
इन हादसों से तो समझो अब तो जनता की पीर
आप ही मियां मंगते द्वार खडे दरवेश
विश्व पटल पर इस शर्म में दर्ज हो गया देश
अब संमेलन में जाना बदलकर अपना भेष
वर्ना अबकी जनता के हाथों से नहीं बचोगे शेष
नेताओं के सामने लोग आ रहे है सरेआम
ऐसे में इस देश का क्या होगा अंजाम?
चर्चा है इस देश में अब होगी किसकी बारी
जनतंत्र की इस ताकत पर मैं तो जाऊं वारी

देर हो गई

जीवन में हर काम में देर हो गई
सुबह जल्दी उठने में देर हो गई
दोपहर के भोजन में देर हो गई
स्टेशन पहुंचने में देर हो गई
ऑफिस पहुंचने में देर हो गई
मंदिर जाकर मत्था टेकने में देर हो गई
चाहे यह सब बोलो
लेकिन, मरने में देर हो गई
ऐसा कोई नहीं बोल पायेगा

शिक्षा की खरीदी

खुद को शिक्षित
मानने वाले लोगों से
क्या मुझे
इस प्रश्न का उत्तर मिलेगा?
कि आपने पैसे से शिक्षा खरीदी है,
या शिक्षा से पैसा बनाया है?
यह देश तो ज्ञान बांटने के बावजूद
पैसा न लेनेवाले पंडितों का है
इसमें डोनेशन से ज्ञान खरीदने वाले,
कहां से घुसे?